Friday, October 26, 2012

राजीव गांधी जीवनदायी स्वास्थ्य योजना



लेख- by Ritesh Bhuyar                                25 /10/ 2012

राजीव गांधी जीवनदायी स्वास्थ्य योजना से महाराष्ट्र के स्वास्थ्य क्षेत्र में स्वास्थदायी की लहर

     महाराष्ट्र के आम लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने हेतू राज्य सरकार ने महत्वकांक्षी राजीव गांधी जीवनदायी स्वास्थ्य योजना शुरु कर सूबे के लोगों  को आरोग्य संपन्न बनाने का प्रयास शुरु किया है. इस योजना के पहले चरण के तहत गड़चिरोली, अमरावती, सोलापूर, नांदेड, धुलिया, रायगड़, मुंबई तथा मुंबई उपनगर जिलों में योजना का क्रियान्वयन शुरु किया है. इस योजना से आठ जिलों के कमजोर तबके के लगभग 49 लाख लोगों  को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा देने के लिए सूबे के 120 सरकारी तथा निजी अस्पतालों का चयन किया गया है. 

                        क्या है यह योजना
        इस योजना के तहत गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन  करनेवाले (बीपीएल - पीला कार्ड धारक) तथा गरीबी रेखा से ऊपर (एपीएल - संतरी रंग के कार्डधारक) रहने वाले परिवारों  को स्वास्थ्य सुविधा का लाभ पहुचाने के लिए एक कार्यक्रम बनाया गया है. इस योजना से स्वास्थ्य सुविधाओं मे गुणवत्ता लाना, विशेष सुविधा मुहैया कराना, अस्पतालों मे जरुरी शल्य चिकित्सा व अन्य चिकित्सा केंद्र उपलब् कराने के साथ ही परामर्श केंद्रों का जाल बुनकर स्वास्थ्य सुविधा क्षेत्र में विकास लाया जा रहा हैं. इस योजना के तहत 30 विशेष सेवा, 972 विशेष प्रणाली केंद्र तथा 121 जांच केंद्र बनाये गये हैं.
        राज्य के 8 जिलों में  इस योजना के लाभार्थियों की पहचान करने हेतू महाराष्ट्र सरकार की और से  उन्हें ` आरोग्य कार्ड ` प्रदान किया जाता है. जिसमें परिवार के मुखिया का नाम तथा अन्य सदस्यों के फोटो संलग्न होते हैं.  एक बार लाभार्थियों का कार्ड उपलब्ध कराने के बाद उनका ऑनलाइन प्रमाणीकरण किया जाता है. इस पश्चात वे इस योजना में सम्मिलित अस्पतालों से अपना मुफ्त इलाज करवा सकते हैं.  इस योजना के तहत,एक साल में पूरे परिवार या किसी भी एक सदस्य के लिए 1.5 लाख रुपए राशी तक का इलाज करवाना संभव होगा. नामचीन बीमा कंपनियों ने अपने कदम आगे बढ़ाते हु इस योजना में सहभाग लिया है. यह कंपनियां राज्य सरकार को  रुग्ण के इलाज बिल सौंपती है. तत्पश्चात सरकार लाभार्थी परिवार का  बीमा प्रीमियम का भुगतान कंपनी के नाम से खुद करती है. लाभार्थी परिवार को स्वास्थ्य सुविधा के लिए जेब से एक पैसा भी खर्च नही करना पड़ता.

                 
                          इलाज कैसे प्राप्त किया जाता है
* कार्डधारक व्यक्ति किसी भी नजदीकी पीएचसी/ग्रामीण, उपजिला, सामान्य, महिला/जिला अस्पताल जा सकता है. इन अस्पतालों में आरोग्य मित्र नामक व्यक्ति कार्ड की पहचान कर कार्ड धारक को उचित मार्गदर्शन कर बीमा कंपनी ने तय किये हुए अस्पताल में प्राथमिक जांच के लिए डाक्टर के पास भेज देता  है. ग्रामीण इलाकों में आयोजित आरोग्य शिबीरो में भी कार्डधारको का इलाज किया जाता है.  दुर्घटनाग्रस्त मरीज सीधे ही इस योजना में  तय किये गये अस्पताल में अपना इलाज कर सकते है.

* नेटवर्क अस्पताल में नियुक्त आरोग्य मित्र पीले तथा संतरी रंग के राशन कार्ड का परीक्षण कर मरीजो को इस अस्पताल के परामर्श केंद्र, प्राथमिक चिकित्सा केंद्र तथा  बुनियादी जांच केंद्र में उपचार हेतू भेजते  है.

* नेटवर्क अस्पताल में जांच के पश्चात मरीज को अस्पताल में भर्ती कराने हेतू बीमा कंपनी को एक आवेदन पत्र भेजा जाता है.

 *  राजीव गांधी जीवनदायी आरोग्य योजना में संलग्न बीमा कंपनी तथा डॉक्टर इस आवेदन पत्र की जांच कर उसे अनुमति प्रदान करते  हैं. जब सभी बाते  योग्य प्रतीत होती है तो इमेल द्वारा यह आवेदन पत्र की पुष्टी की जाती है.

*  अनुज्ञा के तहत नेटवर्क अस्पताल लाभार्थियों को मुफ्त चिकित्सा  प्रदान करता  है.
चिकित्सा प्रक्रिया पूरी होने के पश्चात नेटवर्क अस्पताल लाभार्थी मरीज को बीमा कंपनी से पैसे प्राप्त कराने हेतू ओरिजनल बिल, जांच रिपोर्ट, केस पेपर तथा सेटिसफेक्शन लेटर प्रदान करती है.

* बीमा कंपनी के पास आये बिलों का सही परिक्षण कर उसे मान्यता देकर सात दिनों के अंदर लाभार्थी को इलाज के पैसे लौटाये जाते हैं. 

* कार्डधारक मरीज के इलाज के पश्चात 10 दिन तक नेटवर्क अस्पताल की ओर से उसे मुफ्त जांच परामर्श तथा दवाईया मुहैया कराई जाती हैं.

महाराष्ट्र सरकार ने इस योजना के प्रभावी क्रियान्वयन के लिये  राष्ट्रीय बीमा कंपनी लिमिटेड के साथ एक अनुबंध किया है तथा एमडी इंडिया को तीसरा प्रशासनिक पक्ष नियुक्त किया है.

                        आरोग्य (स्वास्थ्य) मित्र 
नेटवर्क अस्पताल में 24x7  आरोग्य मित्र उपलब्ध होते हैं. यह मरीजों को दाखिल करने तथा उनपर उपचार करने के लिए मागदर्शन करते है.

                        आरोग्य (स्वास्थ्य) कार्ड

इस योजना का लाभ लेने हेतू पात्र परिवार को आरोग्य कार्ड प्रदान किया जाता है. यह कार्ड मिलने के पश्चात लाभार्थी परिवार के सदस्यो के `कलर फोटो ` (size 3''x2'' इंच) जमा कराना अनिवार्य है.   

इस योजना के बारे मे अधिक जानकारी वेबसाइट के जरीए भी उपलब्ध की गई है. www.jeevandayee.gov.in  तथा इस सुविधा के लिए टोल फ्री नंबर भी जारी किए गए है.      1800 233 2200/ 155388.

इस योजना में क्या अंतर्भुत होगा ?
इस योजना के तहत 972 चिकित्सा/थेरपी,121 प्रक्रिया तथा 30 विशेष श्रेणीयों का इसमे समावेश है. तथा निम्न चिकित्साओ का इसमे समावेश है.
1) सामान्य शल्य चिकित्सा
2) इएनटी सर्जरी
3) नेत्र विज्ञान सर्जरी
4) प्रसूतिशास्र और ऑबस्ट्रीक्स सर्जरी
5) आर्थोपेडिक सर्जरी और प्रक्रिया
6) शल्य गैस्ट्रो आंत्रविज्ञान
7) हृदय और कार्डियोथोरेसिक सर्जरी
8) बाल चिकित्सा सर्जरी
9) जेनीटोनरी प्रणाली
10) न्यूरोसर्जरी
11) शल्य चिकित्सा ऑन्कोलॉजी
12) अर्बुदविद्या  चिकित्सा
13) विकिरण ऑन्कोलॉजी
14) प्लास्टिक सर्जरी
15) बर्न्स
16) पाली आघात
17) कृत्रिम अंग
18) महत्वपूर्ण ध्यान
19) सामान्य चिकित्सा
20) संक्रामक रोगों
21) बाल चिकित्सा प्रबंधन
22) हृदयरोगविज्ञान
23) नेफ्रोलॉजी
24) तंत्रिकाविज्ञान
25) पल्मनोलॉजी
26) डर्माटोलॉजी
27) र्‍हेमटोलॉजी
28) एडोक्रिनोलॉजी
29) गैस्ट्रोएंटरोलॉजी
30) इंटरव्हेनशनल रेडियोलोजी
यह योजना पूर्णरुपसे मुफ्त है. इस योजना में उपचार खर्च, दवाईका खर्च, भोजन खर्च  व घरसे अस्पताल तक आनेका खर्चे का समावेश है. योजनामें चिकित्सा उपरांत 10 दिन तक मुफ्त दवाईयां उपलब्ध कराने का प्रावधान है.



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Saturday, August 4, 2012

नागपूर आणि माझी घोर निराशा

नागपूर आणि माझी घोर निराशा 
गाव , आपला  परिसर   सोडून दिल्लीला कार्यक्षेत्र निवडण तस थोड अवघडच होत पण, भविष्यातील ध्येयांचा अचूक वेध घेण्यासाठी तो निर्णय योग्यच होता  हे कळायला आज रोजी(४ ऑगस्ट २०१२) महाराष्ट्राची उप राजधानी नागपुरात  लोकांचा आलेला अनुभव पुरे ठरावा असाच आहे .  उभ्या आयुष्यात बाईक , पाई आणि  स्थानिक वाहतूक व्यवस्थेने  नागपूर फिरण्याची  पहिलीच वेळ पण फार त्रासदायक आणि  घोर निराशा करणारी  होती. 
आमचे परममित्र विकास झाडे यांनी नागपुरात सुरु केलेल्या गुरुकुल व्यसनमुक्ती केंद्राला भेट देण्यासाठी म्हणून नागपूरला आलो होतो. दाभ्याहून नागपूर कडे निघताना ट्राफिक पोलीस महाशय आमच्या बाईकचा  पाठलाग करत आले आणि माझ्याकडे असलेल्या जाड पिशवीत काय आहे ते तपासू लागले त्यांना सांगितल अहो साहेब यात ओहन आहे आणि ते मित्राकडे घेवून जातोय तो पैसे मागायला लागला तोच प्रेस कार्ड दाखवताच तो निघून गेला आणि पुढच्या एका गाडीवानाला गाठून त्याने माझ्यावरील राग काढत त्याच्याकडून चांगलेच पैसे वसूल केले. यावर मी माझ्या सोबत बाईक वर असणाऱ्या मित्राला विचारणा केली तर तो म्हणाला हा नुसता ट्रेलर आहे आगे आगे देखो . . . आणि झालही तसच दिवस भरात रस्त्यावर ट्राफिक पोलिसांची मनमानी आणि जणू खंडणी वसूल करावी तसे वाहन चालकांकडून पैसे वसूल करण्याचे दृष्य बघून मन विषन्न झाले.  त्यात भर पडली ती रस्त्यावर सर्रास नियम तोडून होत असलेली  वाहतूक.  तुलनेने  दिल्लीत मात्र  या दोन्ही बाबत खूप बरे चित्र आहे. दिल्लीत  वाहतूक  नियमाच उलंघन केल्यास घरपोच मेमो येतो आणि म्हणूनच वाहतुकीला सिस्थ पण आहे. इथलेही     ट्राफिक पोलीस  पैसे खातात पण नियमाने ३०० रुपय घेवून २०० ची पावती फडत १०० खिश्यात टाकतात पण नागपुरात तर भर रस्त्यावर गाडी बाजूला घेऊन ट्राफिक पोलीस जणू खंडणीच वसूल करत आहेत असे चित्र होते. त्यामुळे थोड वाईट वाटले पण निराशा तर तेंव्हा झाली की, जनरल स्टोर मध्ये गेलो तेंव्हा त्याने एका लीफाप्यासाठी(ये ४ साईज) माझ्याकडून तब्बल २० रुपये घेतले, २ किमी अंतरासाठी ऑटोवाल्याने ४० रुपये घेतले आणि नेम प्लेट बनवणार्याने ३० रुपये किमतीची नेम प्लेट चक्क ६० रुपयालाच मिळेल या खाली किमतीला विकणार नाही नसेल हवी तर पुढे जा असा उद्धटपण करणारा दुकानदार बघून तळपायाची आग मस्तकात गेली . दिल्लीत जिथे १०० रुपये किंमत सांगितल्यावर त्या दुकानदाराशी भाव करून ७० रुपयापर्यंत वस्तू मिळवणारा मी , मीटर नुसार ऑटो वाणाला पैसे देणारा आणि चिल्लरवस्तू अगदी वाजविदरात वीकत घेणारा मी, मात्र नागपुरातील या महान विदुशिंसमोर नतमस्तक झालो. कळस तर असा की कोणी नीट पत्ता पण सांगत नाहीत आणि चुकीचा पत्ता तर जणू आपल्याला हा पत्ता माहित आहे या अविर्भावात सांगतात . इथले लोकही फार व्यावहारिक आहेत दिलेली वेळ न पाळणे आणि  आपल्या कडे आलेला व्यक्ती जणू मूर्ख आहे असे समजून  मुख कमलावर नकली हास्य मिरवणाऱ्या व्यक्तींची तर इथे पदोपदी भेट झाली. तेंव्हा वाटले की आपण महाराष्ट्रातून बाहेर आलो तेंव्हा  दिल्लीतील लोकच असे नकली आणि बेगडी वागतात असे वाटत होते . पण, नाही नागपूरकर मात्र या बाबतीत पुणेकर आणि मुंबैकरांपेक्षाही काकणभर सरस असल्याची प्रचीती आज आली.
आणि खर संगु तर खूप चीड आली नागपुरातील लोकांची. आतापर्यंत देशातील  भरपूर शहरांमध्ये फिरलो पण, नागपुरातील हे असले अनुभव जरा पचवायला अवघडच वाटले.         




Friday, May 4, 2012

MIHAN the great hope for the VIDARBHA


MIHAN the great hope for the VIDARBHA

Maharashtra has its own identity in country for its speedy development work as you better know this development can see only in the metropolitan city of these state. city  like Mumbai, Pune, Nasik and area an around. But an area like Vidarbha and Marathvada is not much in focus for industrial development these  reason having its own problem like Malnutrition, Drought, less irrigation, Farmer suicide i.e. But now there is the new rising hope for the Vidharbha region by The ambitious Multi Modal International Hub Airport at Nagpur (MIHAN) .It will attract 20 billion dollars foreign investment in next five years and apart from this the project will give boost to 11 district of the Vidarbh region in terms of providing infrastructure and generating better employment. MIHAN will generate 1.20 lakh direct and 4 lakh indirect employment by the year 2020. Special syllabus also meant according that and it is circulated to various university of Vidarbha.
Techno Economic Feasibility Study Report prepared by the consultant M/s L & T Rambol. Maharashtra Airport Development Company (MADC), constituted in 2002 as a special purpose for handling MIHAN and Nagpur International Airport then The Government of Maharashtra accorded approval to the MIHAN project. This project also known as a multi-product special economic zone (SEZ) which is being developed around the airport. The total project area is 4,354 hectares in which 2086 hectares for multi-product SEZ and 1,278 hectares land has acquired for airport.
Looking towards the strength of Nagpur city then we can found , Nagpur is the second capital of Maharashtra which has a strategic geographic central location in India and it is on the international aviation routes as well. Therefore this city was selected for ambitious international aviation and Cargo Hub told S. V. Chahande, chief engineer, MADC, he asserted that about year 2015, MIHAN SEZ is expected set and starts it work which should generate 40,000 crore revenue and will give employment to around 1.20 lakh people.
MIHAN international airport is being planned on 1,278 hectares land and a parallel 60 meters wide runway and 400 meters long for facilitating landing of large cargo and passenger planes. The airport building will have made in around 30 lakh sq.feet area with a capacity of parking of around 100 planes at a time.
MIHAN would consist of international airport hub, special economic zone which would consist of processing, i.e. maintenance, repairing and overhauling. It also consist of IT parks, health city, residential, commercial services. MADC proposed to set up a coal based power plant within MIHAN. MADC is also developing airport in various district in Maharashtra. So we can say MIHAN project is the great hope for the vidarbha region of Maharashtra and it should be change the identity as Developing zone instead of a suicide zone .
------------------------------------------------------- The End -------------------------

Tuesday, May 1, 2012



............आणि मला उत्तर सापडल 

        आज ऑफिसला जायला निघालो आणि बस स्थानकावर बसची वाट बघत होतो, त्यावेळी बघितलेलं दृष्य मन विषन्न करणार होत. एक आंधळा माणूस बसच्या प्रतीक्षेत उभा होता तिथेच  जेमतेम ९ व्या वर्गात शिकणारे गोरे गोमटे,बुटके, अंगात थोडा मळकट शालेय पोशाख घातलेले मुल छोट्या प्लास्टिकच्या पिशवीतून काहीतरी काढत होते. बघतो तर ते विडी काढत होते. त्यातील साजेशी विडी काढून त्या दोन मुलांपैकी एकाने ती ओठात धरून बघितली. नंतर ती दोघही मुल रस्त्याच्या थोड कडेला झाले आणि त्यांनी विडी पेटवली. आळी- पाळीने  झुरके मारू लागले. बसस्थानकावर याच वेळी माझ्या शेजारी चष्मा लावलेला, नीट- नेटका पोशाख घातलेला लहानगा शालेय विध्यार्थी उभा होता तो पण हे दृष्य बघत होता.
      आता दिसत्या घटनेचे आम्ही दोघही साक्षीदार पण मला या प्रश्नाच उत्तर  या लहान मुलांच्या पिढीतील प्रतिनिधीकडून हव होत म्हणून मी त्या मुलाला विचारलं. " कारे तू कोणत्या वर्गात शिकतो आणि कोणत्या शाळेत ? त्याच उत्तर होत सातवीत शिकतोय, केंद्रीय विद्यालायात. त्या मुलाला मी  विचारलं "  ती मुल बघिलीस तू  ?  काय  करताहेत ती  ? . तो क्षणाचाही विलंब न करता उत्तरला, "विडी ओढताहेत ते". मग माझा प्रश्न होता तुझ्यामते ही मुल अस अयोग्य  कृत्य का करीत असतील ? तर तो म्हटला ," वातावरण, ही मुल ज्या शाळेत शिकताहेत कदाचित तेथील इतर मुल पण अशीच असतील आणि त्यांचच अनुकरण करत असतील " हे उत्तर मार्मिक आणि खूप समजूतदार पनाच होत. तो मुलगा म्हणाला "भैया मेरी बस आयी है , अब मै निकलता हू" .
       काही वेळानी ती मुल विडी ओढन झाल्यावर परत बसस्थानकावर आलीत आणि नंतर रोडच्या मधोमध असणाऱ्या दुभाजकावर जाऊन बसले शेजारीच असलेल्या फुटक्या मडक्याचे तुकडे ते रस्त्यावर फेकत होते आणि त्या तुक्ड्याहून रस्त्याने जात असलेल्या एखाद्या दुचाकी व चारचाकी गाडीचे चक गेले कि आनंदी होत होते. थोड्या वेळाने बस स्थानकावर एक गाडी आली त्या मुलांनी तिथेच उभ्या असलेल्या आंधड्या व्यक्तीचा हक मारत सांगितल " अंकल आप कि बस आगायी है" आणि त्याचा  हात धरून त्याला बस मध्ये बसवून त्याच बस मध्ये ती मुल निघून गेली.
      आता मात्र माझ्या डोक्यात वेगाने विचार चक्र सुरु झाल. राजधानी दिल्लीतील एका सरकारी शाळेतील विध्यार्थी व्यसनाच्या आहारी गेलेत तर देशातील दुर्गम भागात अजूनही  जिथ शाळेत शिकायला जायला कोसो दूर पायी चालत जाव लागत तेथील मुलांची काय अवस्था असेल.  संस्कारच मंदिर म्हणवणाऱ्या शाळातील मुल जर व्यसनाधीन होवू लागले असतील तर दोष कुणाचा ? शिक्षकांचा, आई- वडिलांचा की स्वतः मुलांचा ? शालेय जीवनात ही कोवळी मुल जर व्यसनाधीन होत असतील तर पुढ भविष्यात ते समाजाचा घटक म्हणून कसे वागत असतील असे एकानेक प्रश्न माझ्या टाळक्यात रुंजी घालत होते.
         यातच मला ते दिवस आठवले जेंव्हा माझी आई आम्हा दोघही भावांना शाळेत जाण्याआधी  घराशेजारील मंदिरात पाया पडून आल्याशिवाय घरात दुधाच्या  पेल्यास हात लावू देत नव्हती, दुपारी कुशीशी घेवून धार्मिक व महापुरुषांच्या गोष्टी सांगायची ,  आठवीत असतापासून  आई नेच मला बळजबरीने  १ महिन्याच्या उन्हाळी सर्वांगीण विकास शिभिरात पाठवल  होत. "माझ्या आईच शिक्षण ८ वा वर्ग पास पण प्रचंड ती व्हिजनरी आहे" .  नंतर मी स्वताहून सलग ७ वर्ष या शिबिरात गेलो. पुढे स्वतःहूनच चंद्रपूर जिल्ह्यातील, मुल तालुक्यात  सोमनाथ या ठिकाणी थोर समाज सेवक  बाबा आमटे नी सुरु केलेल्या संस्कार शिबिरात २००२ साली गेलो होतो. शिबिरात स्वावलंबन, मेहनत, सामाजिकता, सुसंवाद, नेतृत्वगुण आदि गोष्टी शिकायला मिळाल्या.    या शिबिरामधून शेकडो मुलांशी  संपर्क यायचा पण त्यातील मोजकीच संस्कारित मुल माझे मित्र झाले. मी मित्र निवडण्याच्या  बाबतीत चुजी झालो. आणि आता मला बस स्थानकावरील भेटलेल्या त्या मुलाचे शब्द आठवले " वातावरण, ही मुल ज्या शाळेत शिकताहेत कदाचित तेथील इतर मुल पण अशीच असतील आणि त्यांचच अनुकरण ही विडी ओढणारी मुल करत असतील ". मला माझ्या प्रश्नच उत्तर मिळाल होत.      
      
·         ही पोस्ट वाचणारयास माझी नम्र विनंती राहील की १५ ते २२ मे दरम्यान सोमनाथ येथे संस्कार शिबीराच आयोजन  केल जात आयुष्यात एकदा तरी हे  शिबीर अटेंड कराव मी खात्री देतो की इथे गेल्यावर तुम्हास एक विजन मिळेल. विध्यार्थी दशेत जर हे शिबीर अटेंड केल तर मी तर म्हणेल ते सर्वोत्तम होईल. हे फक्त अनुभावाचेह बोल आहेत. इत्तपर "मर्जी आपकी"   

Friday, April 20, 2012

नागपुर में स्थित विश्वधरोहर स्मारक विदर्भ की शान

नागपुर में स्थित विश्वधरोहर स्मारक विदर्भ की शान
महाराष्ट्र की उप राजधानी नागपुर में स्थित दीक्षा भूमि , ड्रेगन पेलेस, हेडगेवार स्मारक आदि विश्वधरोहर स्मारक विदर्भ की शान हैं . यहाँ देश विदेश से आने वाले सैलानी तथा आम इन्सान डा बाबासाहब अंबेडकर जी के महान कार्यसे पावन हुए दीक्षा भूमि का विशाल प्रांगन देख, जपान की स्वयंसेवी संस्था के सहायतासे ४० एकड़ में स्थित ड्रेगन पेलेस तथा दुनियासे आनेवाले हिन्दुओके प्रतिनिधियों के एकमेव प्रशिक्षण स्थल गोडवलकर स्मारक को भेट देकर खुद को गौरवान्वित महसूस करते है. इन स्मारकों ने विदर्भ को चार चाँद लगा दिए है इस में कोई दो राय नहीं .
नागपुर में दीक्षा भुमिपर डा बाबासाहब अंबेडकर जी का स्मारक बनाया गया है. यों तो इस स्थान का विशेष महत्व है १४ अक्तूबर १९५६ को डा अंबेडकर ने हिन्दू धर्म त्याग कर बोद्ध धर्म का स्वीकार किया था तथा उन्होंने लाखो लोगो को इसी दिन बोद्ध धर्म की दीक्षा दी थी . १४ एकड़ में फैली इस भूमिपर हर साल अशोक विजयादशमी के दिन तथागत भगवान बोद्ध तथा डा बाबासाहब अंबेडकर को अभिवादन करने देश विदेश से लाखो लोग इकठा होते है. डा बाबासाहब अंबेडकर के निर्वान के पश्चात वर्तमान में केरल के राज्यपाल तथा वरिष्ठ राजानेतिक नेता रा सु गवई की अध्यक्षता में बने डा बाबासाहब अंबेडकर स्मारक समिती के सतत प्रयास से यहाँ विशाल स्मारक का निर्माण हुआ. जो की राष्ट्रीय स्मारक के रूप में नामित हुआ. इस स्मारक निर्माण के लिए महाराष्ट्र सरकार ने भारी आर्थिक मदद की है. स्मारक की संरचना की और नजर डाले तो २०० बटा २०० फिट यह स्मारक नजर आता है. इस स्मारक के प्रथम तल पर बने विशेष हाल में ५ हजार लोग एक ही समय ध्यान (मेडीटेशन) कर सकते है. इस हाल की संरचना वास्तु शास्त्र का एक अद्भुत नमूना है , हाल के छत के रूप में बने १२० बटा १२० फिट के विशाल गुम्बत को एक भी पिल्लर नहीं है यह इसकी खास विशेषता कही जा सकती है. बोद्ध भिक्कूओ के निवास हेतु यहाँ ' भिक्कू निवास ' बनाया गया है, श्रीलंका के अनन्त्पुरम से लाये गए छोटे से बोधी वृक्ष का रूपांतरण विशाल बोधी वृक्ष में हुआ है. जो की ,आगंतुको का ध्यान अपने और आकर्षित करता है. पाली भाषा के प्रचार हेतु यहाँ 'पाली भवन ' का निर्माण किया गया है. इसी परिसर में डा बाबासाहब अंबेडकर स्मारक की और से कला -वाणिज्य तथा विधि कालेज का कार्यपालन होता है जिस मे लगभग ५ हजार से भी ज्यादा छात्र- छात्रएं शिक्षा अर्जन करते है.
नागपुर के कामठी इलाके में ४० एकड़ क्षेत्र में बना विशाल ड्रेगन पेलेस भी नागपुर तथा विदर्भ की शान है. जपान के टोकियो शहर से आए ८५० कारीगारो ने इस वास्तु का निर्माण किया जो की, वास्तुशास्त्र का अद्भुत नमूना है. ड्रेगन पेलेस के निर्माण कार्य को २८ महीनो का समय लगा. इस वास्तु ५ करोड़ रुपयों के लागत से बनकर तैयार हुई तथा इस के लिए जपान से सहायता मिली है. हर साल कार्तिक पूर्णिमा के दिन यहाँ जपान से धर्मगुरु आते है. हर रोज यहाँ बोद्ध प्रार्थना होती है विभिन्न धर्मो के लोग इस में सम्मिलित होते है. हर साल दीक्षा भूमि को भेट देने वाले सभी बोद्ध श्रद्धालु ड्रेगन पेलेस को भी भेट देते है ऐसी जानकारी ड्रेगन पेलेस स्मारक समिति की प्रमुख तथा महाराष्ट्र सरकार में मंत्री रही सुरेखा कुंभारे ने दी. वास्तु शास्त्र का एक अच्छा नमूना होने के कारन ड्रेगन पेलेस का नाम आन्तरराष्ट्रिय वास्तु सूचि में दर्ज होणे की बात भी कुंभारे ने कही .
विश्व मे हिन्दुओ के सबसे बड़े संघटन के तौर से मशहूर "राष्ट्रिय स्वयं सेवक संघ "(आरएसएस) का मुख्यालय इसी नागपुर शहर में स्तिथ है. तथा संघ के मुख्य निर्माता केशव बळीराम हेडगेवार जी का यहा रेशीमबाग स्थित विशाल स्मारक अपनी और ध्यान आकर्षित करता है . हेडगेवार स्मारक में जहा हेडगेवार जी का शिल्प बनाया गया ही ठीक उसके नीचे हेडगेवार जी की समाधी यहाँ देखने को मिलती है. उनके समाधी के ठीक सामने संघ के दुसरे सरसंघ चालक गोडवलकर गुरूजी की समाधी भी यहाँ स्थित है. इसी परिसर में सरस्वती विद्या मंदिर तथा विश्व से आनेवाले स्वयं सेवको के निवास हेतु बड़ी ईमारत बनायी गई है . संघ के तृतीय वर्ष की शिक्षा केवल इसी स्मारक में दी जाती है व इस प्रशिक्षण हेतू देश -विदेश के स्वयंसेवक बड़ी तादाद में यहाँ १ महीने के प्रशिक्षण शिबिर में हिस्सा लेने पहुचते है. संघ के सह्कर्यवाहक का चुनाव भी इसी स्मारक में सम्पन्न होता है .
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कवि ग्रेस

विशेष लेख
द्वारा रितेश भुयार
15.2.2012
वा-याने हलते रान के लिए कवि ग्रेस साहित्य पुरस्कार से सन्मानित
संत ज्ञानेश्‍वर ने संस्कृत भाषा में श्रीमद्भगवत गीता का ज्ञान आम मराठी पाठकों के लिए प्राकृत मराठी भाषा मे उदधृत करने का महान कार्य किया. यह घटना मराठी भाषा के इतिहास में मील का पत्थरमानी जाती है. इस पश्चात हर शताब्दी में विभिन्न संस्कारों से मराठी भाषा विकसित हो रही थी. आज भारतीय भाषाओं में मराठी भाषा अग्रस्थान पर है. मराठी भाषा में बडे पैमाने पर निर्मित कथाएँ, काव्यरचना, उपन्यास, आलोचना, नाटक व जिवनीयाँ आदी साहित्यिक कृतीयों को कई नामांकित पुरस्कारों से नवाजा गया है. इस साल 14 फरवरी को मराठी के श्रेष्ठ कवि तथा साहित्यकार ग्रेस उर्फ माणिक सिताराम गोडघाटे को वार्‍याने हलते रानइस निबंध संग्रह के साहित्यिक योगदान के लिए साहित्य अकादेमी का पुरस्कार प्रदान हुआ है. इस अवसरपर मराठी भाषा की उत्कृष्ट रचना के लिए पुरस्कार स्वरूप एक लाख रुपये की धनराशी तथा गौरव चिन्ह प्रदान किया गया है. उनके साहित्यिक जीवनक्षेत्र पर एक नजर.....
ग्रेस अपने भावविश्‍व का विस्तार करते समय जिन अर्थसंवेदनाओं की जागृती करते हैं, ठीक उसी तरह अर्थ संवेदनाओं को पाठकों के मन मे प्रक्षेपित करते हैं. अत: यह संवेदना समजने के लिए पाठकों को अपने ज्ञान व अनुभवों की पुरी क्षमता लगानी होती है. यह प्रतिभा रखने वाले नामचिन मराठी साहित्यकारों में ग्रेस अग्रणी माने जाते हैं.
माँ इस विषय पर विभिन्न भाषाओं में काव्य रचनाएँ लिखी गई है. लेकिन इन कविताओं की पुन:आवृत्ती हमें नजर आएगी. लेकिन,`माँ ` नामक धागा अलग तरह से पिरोने का कार्य करते हुए ग्रेस आदिम संस्कृती में माँ की प्रतिकृती को खोजते है. वह `माँ ` नाम का मुल स्त्रोत बीज में खोजते है. यह खोज करते हुए माँ के स्वरुप तक पहुंचते है. नर मादा में स्थित बीजरुप के सृजन शक्ती को ही वह `माँ` के व्यक्त्तीमत्व का उगम स्थान मानते हैं. अलग सोच की दृष्टी प्राप्त कवि ग्रेस आज मराठी साहित्य में अपनी अलग पहचान बनाए हुए हैं.
ग्रेस के भावविश्व की समग्र निर्मिती प्रक्रिया की नींव तथा उसके इर्दगिर्द प्रतिमाओं के साथ आनेवाला परिसर ही उसका स्रोत है. जो हमे प्राचिनता एवम् आदिमता मे मिलता है. कवि ग्रेस के निबंध संग्रह `वा-याने हलते रान` को साहित्य अकादेमी के वर्ष 2011 के पुरस्कार से सन्मानित किया गया है. ग्रेस की काव्य पंक्ति ही इस निबंध संग्रह का शीर्षक रुप लेकर पाठको से रुबरु होने आयी है. अपने साहित्यिक मुल्यों व विशेषताओं के कारण इन निबंध लेखो ने पाठको तथा साहित्यकारों और आलोचकों के मन जीत लिया तथा अगले पडाव में साहित्य अकादेमी के पुरस्कार पर भी मुहर लगाई है. कवि ग्रेस अपनी रचना प्रक्रिया को उजागर करते है. `वा-याने हलते रान` यह कृति मराठी में लिखीत भारतीय निबंध साहित्य को एक महत्वपूर्ण योगदान मानी गई है.
मानिक सीताराम गोडघाटे ग्रेस का जन्म 1937 में नागपुर, महाराष्ट्र में हुआ. उन्होने मराठी भाषा में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की. उन्हे हिन्दी, अंग्रेजी ,उर्दू सहित अन्य भाषाओं का भी ज्ञान है. उन्होने अपने कार्य-जीवन का प्रांरभ 1966 में धनवटे नेशनल क्वालेज (नागपुर) में मराठी के व्याख्याता के रूप में किया. तत्पश्चात इन्होने वसंतराव नाईक इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल सांइसिज, नागपुर (1968-1977) तथा आर.टी.एम. नागपुर विश्वविद्यालय (1997-2004) में कार्य किया.साहित्य अकादेमी, दिल्ली के परामर्श मंडल, राज्य साहित्य तथा संस्कृति मंडल, महाराष्ट्र राज्य मराठी विश्वकोष निर्मिति मंडल,मुंबई तथा आर.टी.एम. नागपूर विश्वविद्यालय, नागपुर के सेनेट सदस्य भी रह चुके है. कवि ग्रेस ने वर्ष 1958 से साहित्यिक लेखन प्रारंभ किया. उनकी प्रसिध्द रचनाओं में संध्याकाळच्या कविता, राजपूत्र आणि डार्लिंग, चंद्र माधवीचे प्रदेश,सांध्य पर्वातील वैष्णवी, सांजभयाच्या साजणी आदी काव्यसंग्रह प्रसिद्ध है. चर्चबेल, मितवा तथा पुरस्कार प्राप्त वार्‍याने हलते रान आदी कवि ग्रेस रचित लेख संग्रह भी श्रेष्ठतम साहित्यिक मूल्य की कसोटी पर खरे उतरे है !
कवि ग्रेस को उनके साहित्यिक कार्य के लिए अनेक पुरस्कारोसें सन्मानित किया गया है. इन पुरस्कारो में महाराष्ट्र सरकार का उत्कृष्ठ साहित्य निर्मिती पुरस्कार, मारवाडी संमेलन पुरस्कार, दमानी पुरस्कार, जीवनव्रती पुरस्कार(1997) विदर्भ गौरव पुरस्कार, शंकर महर्षि साहित्य पुरस्‍कार, वागविलासिनी पुरस्कार, नागभूषण पुरस्कार (2010),जी.ए. कुलकर्णी पुरस्कार (2010), विदर्भ भूषण पुरस्कार (2011) का समावेश है. साथ ही ग्रेस महाराष्ट्र राज्य साहित्य तथा संस्कृती मंडल के मानद सदस्य भी रह चुके है.
भारत की विभिन्न भाषाओं को संजोए रखकर उनके विकास, प्रचार व प्रसार के लिए कार्य करनेवाली साहित्य अकादेमी विगत 56 सालों से भारत की 24 भाषांओं में विशेष योगदान के लिए पुरस्कार प्रदान करती है. विविध भाषांओं के पाठको की रुची बढाकर उन्हे प्रोत्साहित करने का कार्य साहित्य अकादेमी करती है. 1955 में इस पुरस्कार की शुरुआत हुई तब पुरस्कार राशी पाच हजार रुपये मात्र थी जो वर्ष 2009 में बढकर एक लाख रुपये हुई है.
यह पुरस्कार पानेवाले साहित्य रचना को सालभर के लंबी परिक्षण से गुजरना पडता है. इसके पश्चात चर्चा और अंतिम चयन किया जाता है. इसके लिए विभिन्न भाषा विदोके पेनल बनाए जाते है. प्रादेशिक भाषा में विशेष साहित्यिक योगदान देनेवाली साहित्यिक रचना का ही चयन इस पुरस्कार के लिए किया जाता है. कार्यकारी मंडल के समक्ष आनेवाली रचना जो सभी साहित्यिक नियमों पर खरी उतरती हो उसका ही पुरस्कार के लिए अंतिम चयन होता है.
साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सन्मानित मराठी साहित्यकार व उनकी रचनाओं की ओर देखा जाए तो 1955 में दिए गए पहले मराठी साहित्य रचना का पुरस्कार तर्कतिर्थ लक्ष्मण शास्त्री को वैदीक संस्कृतिचा विकास इस रचना के लिए प्रदान किया गया. इस किताब में सांस्कृतिक इतिहास पर प्रकाश डाला गया है. मराठी के वरिष्ठ कवि बा.सी.मर्ढेंकर (सौदर्य तथा साहित्य), वि.स.खांडेकर (ययाती-उपन्यास), श्री.ना.पेंडसे (रथचक्र-उपन्यास), पु.ल.देशपांडे (व्यक्ती आणि वल्ली-व्यक्तीपर लेख), इरावती कर्वे (युगांत- महाभारत पर आधारित रचना), जी.ए.कुलकर्णी (काजळमाया-लघुकथाएँ), वि.वा.शिरवाडकर (नटसम्राट-नाटक), कवी अनिल (दशपदी- काव्य रचना), आरती प्रभु (नक्षत्रांचे देणे- काव्य रचना), लक्ष्मण माने (उपरा- जीवनी) आदी साहित्यिक रचनाओंको साहित्य अकादेमी पुरस्कार से नवाजा गया है.
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Friday, April 13, 2012

केली पण प्रिती. . . .. .. . . .

केली पण प्रिती. . . .. .. . . .
एक मुलगा जो आपला जीवन साथी निवडावा म्हणून एका मुलीच्या समजून उमजून आणि डोळसपणे प्रेमात पडतो. एकमेकास समजण्याची प्रक्रिया सुरु होते फोन क्वाल, मेसेज आणि काही मोजक्या भेटीही होतात, दोघही एकमेकात गुंततात. लग्नाच्या आणाभाका होतात कस जगायचं? काय करायचं? याबाबतही चर्चा होतात या सर्व घटनाचक्रात एक वर्षाचा कालावधी मागे पडतो . यातच लग्नाचा प्रसंग उभा ठाकतो. ती नेहमी त्याला या विषयांच गांभीर्य समजावून सांगते वेळोवेळी त्याला सांगते की," स्वतःच्या आणि माझ्याही आई- वडिलांजवळ लग्नाचा विचार काढ" . पण, तो या विषयाबाबत प्रचंड गाफील राहतो आणि परिणामस्वरूप तो आणि ती मोठ्या संकटात सापडतात. "तीच लग्न ठरण्याचा दिवस उजाळतो" आज तो तिला आर्जव करतो " एकदा चूक झाली ती मोठ्या मानाने माफ कर पण, आताही वेळ आहे हा कार्यक्रम पार पडण्याआधी आपण सर्वांना समजाऊन सांगू आणि पुन्हा एकत्र येऊ , पण ती त्याला नकार देते " आज मी माझ्या आई वडिलांचा विचार आधी करेल आणि तू आता स्थिती पृर्ववत होण्याची अपेक्षा सोड " सांगते आणि तो पुरता खचून जातो. त्याने तिच्यावर जीवापाड प्रेम केल असत तिच्या शिवाय दुसऱ्या मुलीचा जीवनसाथी म्हणून तो विचारही करुशकत नाही. त्यामुळे तो प्रचंड खचून जातो तीच आता त्याला साथ देण्यास नकार देत असल्याने तो रीतसरपणे या प्रकरणातून माघार घेण्याचा निर्णय घेतो.
पण इथून कहाणीला नव वळण येत. ज्या मुलासोबत तीच लग्न जुळल तो तिच्या समोर लग्नापूर्वीच काही अटी ठेवतो की, ज्या ती स्वीकारू शकत नाही. ती स्वतःस असुरक्षित समजते आणि परत ती त्या मुलाजवळ जाते.तो तिला समजावून सांगण्याचा प्रयत्न करतो पण त्याच वेळी त्याच्या आणि तिच्याही मनात पुन्हा एकत्र येण्याची आशा निर्माण होते. पण तेही दिवा स्वप्नच ठरते." संबंधित दिवशी तू माझ्यासोबत साखरपुडा करण्यासाठी तयार रहा असा म्हणणारी ती , थोड्या वेळ्याने त्याला मेसेज करून कळवते माझी आई आपल्या लग्नाला नाही म्हणते आणि तो मुलगाही ( ज्याच्याशी लग्न जुळलंय तो ) आता आपल्या अटी माघे घेण्यास तयार आहे आणि हा प्रकार तू प्लीज कुणाला सांगू नको"
परत कहाणीला नव वळण येत. मुलगी "साखरपुड्यासाठी तयार रहा" सांगते म्हटल्यावर नव्या उमेदीने तयारीला लागलेला तो मात्र त्या मेसेजमुळे पुरता खचून जातो आणि आता पुन्हा या प्रकरणात न गुंतण्याचा कठोर निर्णय घेतो तसेच यानंतर जीवनात कुण्या मुलीवर प्रेम नाकारण्याच ठरवतो. तो या विचाराप्रत पोहचतो की," त्या मुलीच आपल्यावर खर प्रेमच नव्हत, केवळ जीवनातील सुरक्षितता म्हणून ती मुलगी आपल्या भावनांशी खेळत होती " जर अस नसत तर कुटुंब, समाज याचा विरोध पत्करून त्याला साथ देण्यासाठी ती त्याच्या पाठीशी खंबीरपणे उभी राहिली असती.पण ती हा तर विचार करत नसेल की," ज्यावेळी मी त्याला माझ्या बाजूने आई वडिलांपुढे उभा रहा अशी विनवणी केली तेंव्हा तो उभा राहिला नाही मग मी का त्याग करावा ? " कदाचित तो तिचा विचार योग्य असेल. पण प्रेमात ध्येय गाठण्यासाठी चुका विसरून दोघांनीही पुढे जायचं असत हेही नाकारता येत नाही. तो आणि ती या प्रकरणातून कसे सावरले ? ती आणि तो सध्या कुठे आणि कसे आहेत ? या सर्व प्रश्नाची उत्तरे पुढील वर्षी याच दिवशी लिहिण्याचा संकल्प घेवून पूर्णविराम देतो.
त्या मुलाच्या भावना व्यक्त करणाऱ्या ओळी इथे नमूद कराव्याश्या वाटतात " अखेरचे येतील माझ्या तेच शब्द ओठी , लाख चुका असतील केल्या केली पण प्रिती"
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 आज दिनांक 18 एप्रिल 2013 रोजी म्हणजे तब्बल 1 वर्षाने मी केलेल्या संकल्पानुसार  केली पण्‍ा प्रिती या पोस्टमध्ये उल्लेखित मुला मुलीच्या आयुष्यात काय झाल आणि सध्याची त्यांची स्थिती विषद करणार आहे. 

मुलीचा साखरपुडा पार पडला आणि त्याच दिवशी या मुलाला राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त झाला. नेहमी प्रमाणे त्याला कौतुकाची थाप फारशी कुणी मनातून दिली नाही. पण, एकला चलो रे चं ब्रीद उराशी बाळगून जीवन प्रवास करणार्‍या त्या मुलाची अवस्था 'एका डोळयात आसू तर दुसर्‍या डोळयात हसू' अशी झाली होती.  तो मुलगा पुन्हा आपल्या कामात लागला पण्‍ा त्याच मन कामात लागत नसे त्याच मन त्याला  सारख खात असे अशातही त्या बहाद्दराची भाबडी आशा होती की, तिच्या लग्नाच्या शेवटच्या फेर्‍या पर्यंत आपण आशा सोडायची नाही पण तो पुन्हा अपयशी ठरला त्याची आशा हवेत विरली मुलीचा विवाह संपन्न झाला. तरिही विवाहाच्या दिवशी त्या मुलाने मनाचा हिय्या करुन मुलीला शुभेच्छा दयायला फोन केला आणि तीनेही एवढया घाईत व टेन्शनमध्ये त्याचा फोन घेत शुभेच्छा   स्वीकारल्या. मुलीच लग्न होऊन ती सासरी गेली पण या मुलाच मन स्वत:ला खात होत. त्या मुलीच आपल्यावर खर प्रेम नव्हत तीने नुसता स्वॉफ्ट टार्गेट  म्हणून आपला वापर केला असा त्याचा ग्रह झाला होता जो होने साहाजीकही होते. त्याने ही आता ठरवल होत असेही आता आपण त्या मुलीपासून दूर झालोच आहोत तर एकदा आपल्या मनातील शंका तिला विचारून मोकळ व्हाव पण्‍ा तिच तर लग्न झाल मग कस विचाराव ? हा प्रश्नही होताच पण तरी त्याने पुन्हा एकदा मनाचा हिय्या करून तिला फोन केला आणि तिला विचारलं "तू माझ्यावर खरच प्रेम केल होत का? , तू माझ्याशी लग्न करण्याचा निर्णय स्वत:च्या आई -वडिलांना समजावून सांगण्या इतपत भेकाड होतीस का? आणि का ?" यावर तीच उत्तर होत हो मी तुझ्यावर खर प्रेम केल आणि मी भेकाड होती मात्र का ? याच उत्तर माझ्याकडे नाही.  त्याचवेळी मुलाने म्हटल या प्रश्नांचे खरे नी स्पष्ट उत्तर ऐकूण तुझ्या आयुष्यातून बाहेर पडण्याचा माझा खंबीर निर्णय होता तो कायम आहे पण तू माझ्या प्रश्नांच समर्पक उत्तर  दिल नाही थोड धाडस केल असत तर आपल प्रेम लग्नात परावर्तीत झाल असत आणि आजही तू स्पस्ट बोलायच धाडस करत नाहिएस. तेव्हा आज पासून हे चाप्टर क्लोज आणि आपले फोन वरुन संवादही बंद. पण त्याला रहावे ना लग्नानंतरही तो त्या मुलीची आठवण झाल्यावर तिला फोन करीत असे आणि ती सुध्दा फोन उचलत असे. ते दोघ एकमेंकांचे जोडीदार होऊ शकले नाहीत पण त्यांनी आपल्या निखळ मैत्रीच नात जपलयं. पुढे त्या मुलाने कष्ट उपसून सरकारी नोकरी मिळवली व स्वत:ला सिध्द करुन दाखवल. तेव्हाही त्या मुलाने घरी फोन करुन झाल्यानंतर पहिला फोन तिलाच करुन ही गोड बातमी ऐकवली. हो एक चांगली गोष्ट म्हणजे लग्नानंतरही तीने आपले पदव्युत्तर शिक्षणाचे पेपर दिलेय. आता तिच्या लग्नाला 1 वर्ष पूर्ण होत आहे तीला तिच्या नवर्‍याने आणि कुटुंबाने घालून दिलेल्या चाकोरित पण चेहर्‍यावर स्मीत करत आणि  तिच्याच शब्दात सांगायचे तर  "आनंदी जीवन जगतेय" वास्तव सांगयचे तर तिच्या सो कॉल्ड उद्योगपती नवर्‍याला तीला हनीमूनला घेऊन जाण्यासाठी अजून पर्यंत सवड मिळालेली नाही तिचा ऑलवेज ड्रिम असलेला आग्रयाचा ताजमहाल बघण्याची इच्छाहीही लग्नानंतर अपूर्णच आहे.
                           तो मुलगा तर लग्न करून 'आयुष्याची वाट पुढे रेटेल' ती सुध्दा 'त्याग बीग' करुन संसाराचा गाडा पुढे रेटेल. पण प्रश्न अनुत्तरीतच आहे ' त्या मुलाच्या भावनाही त्याच आहेत' 
" अखेरचे येतील माझ्या तेच शब्द ओठी , लाख चुका असतील केल्या केली पण प्रिती"