Friday, April 20, 2012

कवि ग्रेस

विशेष लेख
द्वारा रितेश भुयार
15.2.2012
वा-याने हलते रान के लिए कवि ग्रेस साहित्य पुरस्कार से सन्मानित
संत ज्ञानेश्‍वर ने संस्कृत भाषा में श्रीमद्भगवत गीता का ज्ञान आम मराठी पाठकों के लिए प्राकृत मराठी भाषा मे उदधृत करने का महान कार्य किया. यह घटना मराठी भाषा के इतिहास में मील का पत्थरमानी जाती है. इस पश्चात हर शताब्दी में विभिन्न संस्कारों से मराठी भाषा विकसित हो रही थी. आज भारतीय भाषाओं में मराठी भाषा अग्रस्थान पर है. मराठी भाषा में बडे पैमाने पर निर्मित कथाएँ, काव्यरचना, उपन्यास, आलोचना, नाटक व जिवनीयाँ आदी साहित्यिक कृतीयों को कई नामांकित पुरस्कारों से नवाजा गया है. इस साल 14 फरवरी को मराठी के श्रेष्ठ कवि तथा साहित्यकार ग्रेस उर्फ माणिक सिताराम गोडघाटे को वार्‍याने हलते रानइस निबंध संग्रह के साहित्यिक योगदान के लिए साहित्य अकादेमी का पुरस्कार प्रदान हुआ है. इस अवसरपर मराठी भाषा की उत्कृष्ट रचना के लिए पुरस्कार स्वरूप एक लाख रुपये की धनराशी तथा गौरव चिन्ह प्रदान किया गया है. उनके साहित्यिक जीवनक्षेत्र पर एक नजर.....
ग्रेस अपने भावविश्‍व का विस्तार करते समय जिन अर्थसंवेदनाओं की जागृती करते हैं, ठीक उसी तरह अर्थ संवेदनाओं को पाठकों के मन मे प्रक्षेपित करते हैं. अत: यह संवेदना समजने के लिए पाठकों को अपने ज्ञान व अनुभवों की पुरी क्षमता लगानी होती है. यह प्रतिभा रखने वाले नामचिन मराठी साहित्यकारों में ग्रेस अग्रणी माने जाते हैं.
माँ इस विषय पर विभिन्न भाषाओं में काव्य रचनाएँ लिखी गई है. लेकिन इन कविताओं की पुन:आवृत्ती हमें नजर आएगी. लेकिन,`माँ ` नामक धागा अलग तरह से पिरोने का कार्य करते हुए ग्रेस आदिम संस्कृती में माँ की प्रतिकृती को खोजते है. वह `माँ ` नाम का मुल स्त्रोत बीज में खोजते है. यह खोज करते हुए माँ के स्वरुप तक पहुंचते है. नर मादा में स्थित बीजरुप के सृजन शक्ती को ही वह `माँ` के व्यक्त्तीमत्व का उगम स्थान मानते हैं. अलग सोच की दृष्टी प्राप्त कवि ग्रेस आज मराठी साहित्य में अपनी अलग पहचान बनाए हुए हैं.
ग्रेस के भावविश्व की समग्र निर्मिती प्रक्रिया की नींव तथा उसके इर्दगिर्द प्रतिमाओं के साथ आनेवाला परिसर ही उसका स्रोत है. जो हमे प्राचिनता एवम् आदिमता मे मिलता है. कवि ग्रेस के निबंध संग्रह `वा-याने हलते रान` को साहित्य अकादेमी के वर्ष 2011 के पुरस्कार से सन्मानित किया गया है. ग्रेस की काव्य पंक्ति ही इस निबंध संग्रह का शीर्षक रुप लेकर पाठको से रुबरु होने आयी है. अपने साहित्यिक मुल्यों व विशेषताओं के कारण इन निबंध लेखो ने पाठको तथा साहित्यकारों और आलोचकों के मन जीत लिया तथा अगले पडाव में साहित्य अकादेमी के पुरस्कार पर भी मुहर लगाई है. कवि ग्रेस अपनी रचना प्रक्रिया को उजागर करते है. `वा-याने हलते रान` यह कृति मराठी में लिखीत भारतीय निबंध साहित्य को एक महत्वपूर्ण योगदान मानी गई है.
मानिक सीताराम गोडघाटे ग्रेस का जन्म 1937 में नागपुर, महाराष्ट्र में हुआ. उन्होने मराठी भाषा में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की. उन्हे हिन्दी, अंग्रेजी ,उर्दू सहित अन्य भाषाओं का भी ज्ञान है. उन्होने अपने कार्य-जीवन का प्रांरभ 1966 में धनवटे नेशनल क्वालेज (नागपुर) में मराठी के व्याख्याता के रूप में किया. तत्पश्चात इन्होने वसंतराव नाईक इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल सांइसिज, नागपुर (1968-1977) तथा आर.टी.एम. नागपुर विश्वविद्यालय (1997-2004) में कार्य किया.साहित्य अकादेमी, दिल्ली के परामर्श मंडल, राज्य साहित्य तथा संस्कृति मंडल, महाराष्ट्र राज्य मराठी विश्वकोष निर्मिति मंडल,मुंबई तथा आर.टी.एम. नागपूर विश्वविद्यालय, नागपुर के सेनेट सदस्य भी रह चुके है. कवि ग्रेस ने वर्ष 1958 से साहित्यिक लेखन प्रारंभ किया. उनकी प्रसिध्द रचनाओं में संध्याकाळच्या कविता, राजपूत्र आणि डार्लिंग, चंद्र माधवीचे प्रदेश,सांध्य पर्वातील वैष्णवी, सांजभयाच्या साजणी आदी काव्यसंग्रह प्रसिद्ध है. चर्चबेल, मितवा तथा पुरस्कार प्राप्त वार्‍याने हलते रान आदी कवि ग्रेस रचित लेख संग्रह भी श्रेष्ठतम साहित्यिक मूल्य की कसोटी पर खरे उतरे है !
कवि ग्रेस को उनके साहित्यिक कार्य के लिए अनेक पुरस्कारोसें सन्मानित किया गया है. इन पुरस्कारो में महाराष्ट्र सरकार का उत्कृष्ठ साहित्य निर्मिती पुरस्कार, मारवाडी संमेलन पुरस्कार, दमानी पुरस्कार, जीवनव्रती पुरस्कार(1997) विदर्भ गौरव पुरस्कार, शंकर महर्षि साहित्य पुरस्‍कार, वागविलासिनी पुरस्कार, नागभूषण पुरस्कार (2010),जी.ए. कुलकर्णी पुरस्कार (2010), विदर्भ भूषण पुरस्कार (2011) का समावेश है. साथ ही ग्रेस महाराष्ट्र राज्य साहित्य तथा संस्कृती मंडल के मानद सदस्य भी रह चुके है.
भारत की विभिन्न भाषाओं को संजोए रखकर उनके विकास, प्रचार व प्रसार के लिए कार्य करनेवाली साहित्य अकादेमी विगत 56 सालों से भारत की 24 भाषांओं में विशेष योगदान के लिए पुरस्कार प्रदान करती है. विविध भाषांओं के पाठको की रुची बढाकर उन्हे प्रोत्साहित करने का कार्य साहित्य अकादेमी करती है. 1955 में इस पुरस्कार की शुरुआत हुई तब पुरस्कार राशी पाच हजार रुपये मात्र थी जो वर्ष 2009 में बढकर एक लाख रुपये हुई है.
यह पुरस्कार पानेवाले साहित्य रचना को सालभर के लंबी परिक्षण से गुजरना पडता है. इसके पश्चात चर्चा और अंतिम चयन किया जाता है. इसके लिए विभिन्न भाषा विदोके पेनल बनाए जाते है. प्रादेशिक भाषा में विशेष साहित्यिक योगदान देनेवाली साहित्यिक रचना का ही चयन इस पुरस्कार के लिए किया जाता है. कार्यकारी मंडल के समक्ष आनेवाली रचना जो सभी साहित्यिक नियमों पर खरी उतरती हो उसका ही पुरस्कार के लिए अंतिम चयन होता है.
साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सन्मानित मराठी साहित्यकार व उनकी रचनाओं की ओर देखा जाए तो 1955 में दिए गए पहले मराठी साहित्य रचना का पुरस्कार तर्कतिर्थ लक्ष्मण शास्त्री को वैदीक संस्कृतिचा विकास इस रचना के लिए प्रदान किया गया. इस किताब में सांस्कृतिक इतिहास पर प्रकाश डाला गया है. मराठी के वरिष्ठ कवि बा.सी.मर्ढेंकर (सौदर्य तथा साहित्य), वि.स.खांडेकर (ययाती-उपन्यास), श्री.ना.पेंडसे (रथचक्र-उपन्यास), पु.ल.देशपांडे (व्यक्ती आणि वल्ली-व्यक्तीपर लेख), इरावती कर्वे (युगांत- महाभारत पर आधारित रचना), जी.ए.कुलकर्णी (काजळमाया-लघुकथाएँ), वि.वा.शिरवाडकर (नटसम्राट-नाटक), कवी अनिल (दशपदी- काव्य रचना), आरती प्रभु (नक्षत्रांचे देणे- काव्य रचना), लक्ष्मण माने (उपरा- जीवनी) आदी साहित्यिक रचनाओंको साहित्य अकादेमी पुरस्कार से नवाजा गया है.
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