Friday, April 20, 2012

नागपुर में स्थित विश्वधरोहर स्मारक विदर्भ की शान

नागपुर में स्थित विश्वधरोहर स्मारक विदर्भ की शान
महाराष्ट्र की उप राजधानी नागपुर में स्थित दीक्षा भूमि , ड्रेगन पेलेस, हेडगेवार स्मारक आदि विश्वधरोहर स्मारक विदर्भ की शान हैं . यहाँ देश विदेश से आने वाले सैलानी तथा आम इन्सान डा बाबासाहब अंबेडकर जी के महान कार्यसे पावन हुए दीक्षा भूमि का विशाल प्रांगन देख, जपान की स्वयंसेवी संस्था के सहायतासे ४० एकड़ में स्थित ड्रेगन पेलेस तथा दुनियासे आनेवाले हिन्दुओके प्रतिनिधियों के एकमेव प्रशिक्षण स्थल गोडवलकर स्मारक को भेट देकर खुद को गौरवान्वित महसूस करते है. इन स्मारकों ने विदर्भ को चार चाँद लगा दिए है इस में कोई दो राय नहीं .
नागपुर में दीक्षा भुमिपर डा बाबासाहब अंबेडकर जी का स्मारक बनाया गया है. यों तो इस स्थान का विशेष महत्व है १४ अक्तूबर १९५६ को डा अंबेडकर ने हिन्दू धर्म त्याग कर बोद्ध धर्म का स्वीकार किया था तथा उन्होंने लाखो लोगो को इसी दिन बोद्ध धर्म की दीक्षा दी थी . १४ एकड़ में फैली इस भूमिपर हर साल अशोक विजयादशमी के दिन तथागत भगवान बोद्ध तथा डा बाबासाहब अंबेडकर को अभिवादन करने देश विदेश से लाखो लोग इकठा होते है. डा बाबासाहब अंबेडकर के निर्वान के पश्चात वर्तमान में केरल के राज्यपाल तथा वरिष्ठ राजानेतिक नेता रा सु गवई की अध्यक्षता में बने डा बाबासाहब अंबेडकर स्मारक समिती के सतत प्रयास से यहाँ विशाल स्मारक का निर्माण हुआ. जो की राष्ट्रीय स्मारक के रूप में नामित हुआ. इस स्मारक निर्माण के लिए महाराष्ट्र सरकार ने भारी आर्थिक मदद की है. स्मारक की संरचना की और नजर डाले तो २०० बटा २०० फिट यह स्मारक नजर आता है. इस स्मारक के प्रथम तल पर बने विशेष हाल में ५ हजार लोग एक ही समय ध्यान (मेडीटेशन) कर सकते है. इस हाल की संरचना वास्तु शास्त्र का एक अद्भुत नमूना है , हाल के छत के रूप में बने १२० बटा १२० फिट के विशाल गुम्बत को एक भी पिल्लर नहीं है यह इसकी खास विशेषता कही जा सकती है. बोद्ध भिक्कूओ के निवास हेतु यहाँ ' भिक्कू निवास ' बनाया गया है, श्रीलंका के अनन्त्पुरम से लाये गए छोटे से बोधी वृक्ष का रूपांतरण विशाल बोधी वृक्ष में हुआ है. जो की ,आगंतुको का ध्यान अपने और आकर्षित करता है. पाली भाषा के प्रचार हेतु यहाँ 'पाली भवन ' का निर्माण किया गया है. इसी परिसर में डा बाबासाहब अंबेडकर स्मारक की और से कला -वाणिज्य तथा विधि कालेज का कार्यपालन होता है जिस मे लगभग ५ हजार से भी ज्यादा छात्र- छात्रएं शिक्षा अर्जन करते है.
नागपुर के कामठी इलाके में ४० एकड़ क्षेत्र में बना विशाल ड्रेगन पेलेस भी नागपुर तथा विदर्भ की शान है. जपान के टोकियो शहर से आए ८५० कारीगारो ने इस वास्तु का निर्माण किया जो की, वास्तुशास्त्र का अद्भुत नमूना है. ड्रेगन पेलेस के निर्माण कार्य को २८ महीनो का समय लगा. इस वास्तु ५ करोड़ रुपयों के लागत से बनकर तैयार हुई तथा इस के लिए जपान से सहायता मिली है. हर साल कार्तिक पूर्णिमा के दिन यहाँ जपान से धर्मगुरु आते है. हर रोज यहाँ बोद्ध प्रार्थना होती है विभिन्न धर्मो के लोग इस में सम्मिलित होते है. हर साल दीक्षा भूमि को भेट देने वाले सभी बोद्ध श्रद्धालु ड्रेगन पेलेस को भी भेट देते है ऐसी जानकारी ड्रेगन पेलेस स्मारक समिति की प्रमुख तथा महाराष्ट्र सरकार में मंत्री रही सुरेखा कुंभारे ने दी. वास्तु शास्त्र का एक अच्छा नमूना होने के कारन ड्रेगन पेलेस का नाम आन्तरराष्ट्रिय वास्तु सूचि में दर्ज होणे की बात भी कुंभारे ने कही .
विश्व मे हिन्दुओ के सबसे बड़े संघटन के तौर से मशहूर "राष्ट्रिय स्वयं सेवक संघ "(आरएसएस) का मुख्यालय इसी नागपुर शहर में स्तिथ है. तथा संघ के मुख्य निर्माता केशव बळीराम हेडगेवार जी का यहा रेशीमबाग स्थित विशाल स्मारक अपनी और ध्यान आकर्षित करता है . हेडगेवार स्मारक में जहा हेडगेवार जी का शिल्प बनाया गया ही ठीक उसके नीचे हेडगेवार जी की समाधी यहाँ देखने को मिलती है. उनके समाधी के ठीक सामने संघ के दुसरे सरसंघ चालक गोडवलकर गुरूजी की समाधी भी यहाँ स्थित है. इसी परिसर में सरस्वती विद्या मंदिर तथा विश्व से आनेवाले स्वयं सेवको के निवास हेतु बड़ी ईमारत बनायी गई है . संघ के तृतीय वर्ष की शिक्षा केवल इसी स्मारक में दी जाती है व इस प्रशिक्षण हेतू देश -विदेश के स्वयंसेवक बड़ी तादाद में यहाँ १ महीने के प्रशिक्षण शिबिर में हिस्सा लेने पहुचते है. संघ के सह्कर्यवाहक का चुनाव भी इसी स्मारक में सम्पन्न होता है .
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कवि ग्रेस

विशेष लेख
द्वारा रितेश भुयार
15.2.2012
वा-याने हलते रान के लिए कवि ग्रेस साहित्य पुरस्कार से सन्मानित
संत ज्ञानेश्‍वर ने संस्कृत भाषा में श्रीमद्भगवत गीता का ज्ञान आम मराठी पाठकों के लिए प्राकृत मराठी भाषा मे उदधृत करने का महान कार्य किया. यह घटना मराठी भाषा के इतिहास में मील का पत्थरमानी जाती है. इस पश्चात हर शताब्दी में विभिन्न संस्कारों से मराठी भाषा विकसित हो रही थी. आज भारतीय भाषाओं में मराठी भाषा अग्रस्थान पर है. मराठी भाषा में बडे पैमाने पर निर्मित कथाएँ, काव्यरचना, उपन्यास, आलोचना, नाटक व जिवनीयाँ आदी साहित्यिक कृतीयों को कई नामांकित पुरस्कारों से नवाजा गया है. इस साल 14 फरवरी को मराठी के श्रेष्ठ कवि तथा साहित्यकार ग्रेस उर्फ माणिक सिताराम गोडघाटे को वार्‍याने हलते रानइस निबंध संग्रह के साहित्यिक योगदान के लिए साहित्य अकादेमी का पुरस्कार प्रदान हुआ है. इस अवसरपर मराठी भाषा की उत्कृष्ट रचना के लिए पुरस्कार स्वरूप एक लाख रुपये की धनराशी तथा गौरव चिन्ह प्रदान किया गया है. उनके साहित्यिक जीवनक्षेत्र पर एक नजर.....
ग्रेस अपने भावविश्‍व का विस्तार करते समय जिन अर्थसंवेदनाओं की जागृती करते हैं, ठीक उसी तरह अर्थ संवेदनाओं को पाठकों के मन मे प्रक्षेपित करते हैं. अत: यह संवेदना समजने के लिए पाठकों को अपने ज्ञान व अनुभवों की पुरी क्षमता लगानी होती है. यह प्रतिभा रखने वाले नामचिन मराठी साहित्यकारों में ग्रेस अग्रणी माने जाते हैं.
माँ इस विषय पर विभिन्न भाषाओं में काव्य रचनाएँ लिखी गई है. लेकिन इन कविताओं की पुन:आवृत्ती हमें नजर आएगी. लेकिन,`माँ ` नामक धागा अलग तरह से पिरोने का कार्य करते हुए ग्रेस आदिम संस्कृती में माँ की प्रतिकृती को खोजते है. वह `माँ ` नाम का मुल स्त्रोत बीज में खोजते है. यह खोज करते हुए माँ के स्वरुप तक पहुंचते है. नर मादा में स्थित बीजरुप के सृजन शक्ती को ही वह `माँ` के व्यक्त्तीमत्व का उगम स्थान मानते हैं. अलग सोच की दृष्टी प्राप्त कवि ग्रेस आज मराठी साहित्य में अपनी अलग पहचान बनाए हुए हैं.
ग्रेस के भावविश्व की समग्र निर्मिती प्रक्रिया की नींव तथा उसके इर्दगिर्द प्रतिमाओं के साथ आनेवाला परिसर ही उसका स्रोत है. जो हमे प्राचिनता एवम् आदिमता मे मिलता है. कवि ग्रेस के निबंध संग्रह `वा-याने हलते रान` को साहित्य अकादेमी के वर्ष 2011 के पुरस्कार से सन्मानित किया गया है. ग्रेस की काव्य पंक्ति ही इस निबंध संग्रह का शीर्षक रुप लेकर पाठको से रुबरु होने आयी है. अपने साहित्यिक मुल्यों व विशेषताओं के कारण इन निबंध लेखो ने पाठको तथा साहित्यकारों और आलोचकों के मन जीत लिया तथा अगले पडाव में साहित्य अकादेमी के पुरस्कार पर भी मुहर लगाई है. कवि ग्रेस अपनी रचना प्रक्रिया को उजागर करते है. `वा-याने हलते रान` यह कृति मराठी में लिखीत भारतीय निबंध साहित्य को एक महत्वपूर्ण योगदान मानी गई है.
मानिक सीताराम गोडघाटे ग्रेस का जन्म 1937 में नागपुर, महाराष्ट्र में हुआ. उन्होने मराठी भाषा में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की. उन्हे हिन्दी, अंग्रेजी ,उर्दू सहित अन्य भाषाओं का भी ज्ञान है. उन्होने अपने कार्य-जीवन का प्रांरभ 1966 में धनवटे नेशनल क्वालेज (नागपुर) में मराठी के व्याख्याता के रूप में किया. तत्पश्चात इन्होने वसंतराव नाईक इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल सांइसिज, नागपुर (1968-1977) तथा आर.टी.एम. नागपुर विश्वविद्यालय (1997-2004) में कार्य किया.साहित्य अकादेमी, दिल्ली के परामर्श मंडल, राज्य साहित्य तथा संस्कृति मंडल, महाराष्ट्र राज्य मराठी विश्वकोष निर्मिति मंडल,मुंबई तथा आर.टी.एम. नागपूर विश्वविद्यालय, नागपुर के सेनेट सदस्य भी रह चुके है. कवि ग्रेस ने वर्ष 1958 से साहित्यिक लेखन प्रारंभ किया. उनकी प्रसिध्द रचनाओं में संध्याकाळच्या कविता, राजपूत्र आणि डार्लिंग, चंद्र माधवीचे प्रदेश,सांध्य पर्वातील वैष्णवी, सांजभयाच्या साजणी आदी काव्यसंग्रह प्रसिद्ध है. चर्चबेल, मितवा तथा पुरस्कार प्राप्त वार्‍याने हलते रान आदी कवि ग्रेस रचित लेख संग्रह भी श्रेष्ठतम साहित्यिक मूल्य की कसोटी पर खरे उतरे है !
कवि ग्रेस को उनके साहित्यिक कार्य के लिए अनेक पुरस्कारोसें सन्मानित किया गया है. इन पुरस्कारो में महाराष्ट्र सरकार का उत्कृष्ठ साहित्य निर्मिती पुरस्कार, मारवाडी संमेलन पुरस्कार, दमानी पुरस्कार, जीवनव्रती पुरस्कार(1997) विदर्भ गौरव पुरस्कार, शंकर महर्षि साहित्य पुरस्‍कार, वागविलासिनी पुरस्कार, नागभूषण पुरस्कार (2010),जी.ए. कुलकर्णी पुरस्कार (2010), विदर्भ भूषण पुरस्कार (2011) का समावेश है. साथ ही ग्रेस महाराष्ट्र राज्य साहित्य तथा संस्कृती मंडल के मानद सदस्य भी रह चुके है.
भारत की विभिन्न भाषाओं को संजोए रखकर उनके विकास, प्रचार व प्रसार के लिए कार्य करनेवाली साहित्य अकादेमी विगत 56 सालों से भारत की 24 भाषांओं में विशेष योगदान के लिए पुरस्कार प्रदान करती है. विविध भाषांओं के पाठको की रुची बढाकर उन्हे प्रोत्साहित करने का कार्य साहित्य अकादेमी करती है. 1955 में इस पुरस्कार की शुरुआत हुई तब पुरस्कार राशी पाच हजार रुपये मात्र थी जो वर्ष 2009 में बढकर एक लाख रुपये हुई है.
यह पुरस्कार पानेवाले साहित्य रचना को सालभर के लंबी परिक्षण से गुजरना पडता है. इसके पश्चात चर्चा और अंतिम चयन किया जाता है. इसके लिए विभिन्न भाषा विदोके पेनल बनाए जाते है. प्रादेशिक भाषा में विशेष साहित्यिक योगदान देनेवाली साहित्यिक रचना का ही चयन इस पुरस्कार के लिए किया जाता है. कार्यकारी मंडल के समक्ष आनेवाली रचना जो सभी साहित्यिक नियमों पर खरी उतरती हो उसका ही पुरस्कार के लिए अंतिम चयन होता है.
साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सन्मानित मराठी साहित्यकार व उनकी रचनाओं की ओर देखा जाए तो 1955 में दिए गए पहले मराठी साहित्य रचना का पुरस्कार तर्कतिर्थ लक्ष्मण शास्त्री को वैदीक संस्कृतिचा विकास इस रचना के लिए प्रदान किया गया. इस किताब में सांस्कृतिक इतिहास पर प्रकाश डाला गया है. मराठी के वरिष्ठ कवि बा.सी.मर्ढेंकर (सौदर्य तथा साहित्य), वि.स.खांडेकर (ययाती-उपन्यास), श्री.ना.पेंडसे (रथचक्र-उपन्यास), पु.ल.देशपांडे (व्यक्ती आणि वल्ली-व्यक्तीपर लेख), इरावती कर्वे (युगांत- महाभारत पर आधारित रचना), जी.ए.कुलकर्णी (काजळमाया-लघुकथाएँ), वि.वा.शिरवाडकर (नटसम्राट-नाटक), कवी अनिल (दशपदी- काव्य रचना), आरती प्रभु (नक्षत्रांचे देणे- काव्य रचना), लक्ष्मण माने (उपरा- जीवनी) आदी साहित्यिक रचनाओंको साहित्य अकादेमी पुरस्कार से नवाजा गया है.
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Friday, April 13, 2012

केली पण प्रिती. . . .. .. . . .

केली पण प्रिती. . . .. .. . . .
एक मुलगा जो आपला जीवन साथी निवडावा म्हणून एका मुलीच्या समजून उमजून आणि डोळसपणे प्रेमात पडतो. एकमेकास समजण्याची प्रक्रिया सुरु होते फोन क्वाल, मेसेज आणि काही मोजक्या भेटीही होतात, दोघही एकमेकात गुंततात. लग्नाच्या आणाभाका होतात कस जगायचं? काय करायचं? याबाबतही चर्चा होतात या सर्व घटनाचक्रात एक वर्षाचा कालावधी मागे पडतो . यातच लग्नाचा प्रसंग उभा ठाकतो. ती नेहमी त्याला या विषयांच गांभीर्य समजावून सांगते वेळोवेळी त्याला सांगते की," स्वतःच्या आणि माझ्याही आई- वडिलांजवळ लग्नाचा विचार काढ" . पण, तो या विषयाबाबत प्रचंड गाफील राहतो आणि परिणामस्वरूप तो आणि ती मोठ्या संकटात सापडतात. "तीच लग्न ठरण्याचा दिवस उजाळतो" आज तो तिला आर्जव करतो " एकदा चूक झाली ती मोठ्या मानाने माफ कर पण, आताही वेळ आहे हा कार्यक्रम पार पडण्याआधी आपण सर्वांना समजाऊन सांगू आणि पुन्हा एकत्र येऊ , पण ती त्याला नकार देते " आज मी माझ्या आई वडिलांचा विचार आधी करेल आणि तू आता स्थिती पृर्ववत होण्याची अपेक्षा सोड " सांगते आणि तो पुरता खचून जातो. त्याने तिच्यावर जीवापाड प्रेम केल असत तिच्या शिवाय दुसऱ्या मुलीचा जीवनसाथी म्हणून तो विचारही करुशकत नाही. त्यामुळे तो प्रचंड खचून जातो तीच आता त्याला साथ देण्यास नकार देत असल्याने तो रीतसरपणे या प्रकरणातून माघार घेण्याचा निर्णय घेतो.
पण इथून कहाणीला नव वळण येत. ज्या मुलासोबत तीच लग्न जुळल तो तिच्या समोर लग्नापूर्वीच काही अटी ठेवतो की, ज्या ती स्वीकारू शकत नाही. ती स्वतःस असुरक्षित समजते आणि परत ती त्या मुलाजवळ जाते.तो तिला समजावून सांगण्याचा प्रयत्न करतो पण त्याच वेळी त्याच्या आणि तिच्याही मनात पुन्हा एकत्र येण्याची आशा निर्माण होते. पण तेही दिवा स्वप्नच ठरते." संबंधित दिवशी तू माझ्यासोबत साखरपुडा करण्यासाठी तयार रहा असा म्हणणारी ती , थोड्या वेळ्याने त्याला मेसेज करून कळवते माझी आई आपल्या लग्नाला नाही म्हणते आणि तो मुलगाही ( ज्याच्याशी लग्न जुळलंय तो ) आता आपल्या अटी माघे घेण्यास तयार आहे आणि हा प्रकार तू प्लीज कुणाला सांगू नको"
परत कहाणीला नव वळण येत. मुलगी "साखरपुड्यासाठी तयार रहा" सांगते म्हटल्यावर नव्या उमेदीने तयारीला लागलेला तो मात्र त्या मेसेजमुळे पुरता खचून जातो आणि आता पुन्हा या प्रकरणात न गुंतण्याचा कठोर निर्णय घेतो तसेच यानंतर जीवनात कुण्या मुलीवर प्रेम नाकारण्याच ठरवतो. तो या विचाराप्रत पोहचतो की," त्या मुलीच आपल्यावर खर प्रेमच नव्हत, केवळ जीवनातील सुरक्षितता म्हणून ती मुलगी आपल्या भावनांशी खेळत होती " जर अस नसत तर कुटुंब, समाज याचा विरोध पत्करून त्याला साथ देण्यासाठी ती त्याच्या पाठीशी खंबीरपणे उभी राहिली असती.पण ती हा तर विचार करत नसेल की," ज्यावेळी मी त्याला माझ्या बाजूने आई वडिलांपुढे उभा रहा अशी विनवणी केली तेंव्हा तो उभा राहिला नाही मग मी का त्याग करावा ? " कदाचित तो तिचा विचार योग्य असेल. पण प्रेमात ध्येय गाठण्यासाठी चुका विसरून दोघांनीही पुढे जायचं असत हेही नाकारता येत नाही. तो आणि ती या प्रकरणातून कसे सावरले ? ती आणि तो सध्या कुठे आणि कसे आहेत ? या सर्व प्रश्नाची उत्तरे पुढील वर्षी याच दिवशी लिहिण्याचा संकल्प घेवून पूर्णविराम देतो.
त्या मुलाच्या भावना व्यक्त करणाऱ्या ओळी इथे नमूद कराव्याश्या वाटतात " अखेरचे येतील माझ्या तेच शब्द ओठी , लाख चुका असतील केल्या केली पण प्रिती"
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 आज दिनांक 18 एप्रिल 2013 रोजी म्हणजे तब्बल 1 वर्षाने मी केलेल्या संकल्पानुसार  केली पण्‍ा प्रिती या पोस्टमध्ये उल्लेखित मुला मुलीच्या आयुष्यात काय झाल आणि सध्याची त्यांची स्थिती विषद करणार आहे. 

मुलीचा साखरपुडा पार पडला आणि त्याच दिवशी या मुलाला राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त झाला. नेहमी प्रमाणे त्याला कौतुकाची थाप फारशी कुणी मनातून दिली नाही. पण, एकला चलो रे चं ब्रीद उराशी बाळगून जीवन प्रवास करणार्‍या त्या मुलाची अवस्था 'एका डोळयात आसू तर दुसर्‍या डोळयात हसू' अशी झाली होती.  तो मुलगा पुन्हा आपल्या कामात लागला पण्‍ा त्याच मन कामात लागत नसे त्याच मन त्याला  सारख खात असे अशातही त्या बहाद्दराची भाबडी आशा होती की, तिच्या लग्नाच्या शेवटच्या फेर्‍या पर्यंत आपण आशा सोडायची नाही पण तो पुन्हा अपयशी ठरला त्याची आशा हवेत विरली मुलीचा विवाह संपन्न झाला. तरिही विवाहाच्या दिवशी त्या मुलाने मनाचा हिय्या करुन मुलीला शुभेच्छा दयायला फोन केला आणि तीनेही एवढया घाईत व टेन्शनमध्ये त्याचा फोन घेत शुभेच्छा   स्वीकारल्या. मुलीच लग्न होऊन ती सासरी गेली पण या मुलाच मन स्वत:ला खात होत. त्या मुलीच आपल्यावर खर प्रेम नव्हत तीने नुसता स्वॉफ्ट टार्गेट  म्हणून आपला वापर केला असा त्याचा ग्रह झाला होता जो होने साहाजीकही होते. त्याने ही आता ठरवल होत असेही आता आपण त्या मुलीपासून दूर झालोच आहोत तर एकदा आपल्या मनातील शंका तिला विचारून मोकळ व्हाव पण्‍ा तिच तर लग्न झाल मग कस विचाराव ? हा प्रश्नही होताच पण तरी त्याने पुन्हा एकदा मनाचा हिय्या करून तिला फोन केला आणि तिला विचारलं "तू माझ्यावर खरच प्रेम केल होत का? , तू माझ्याशी लग्न करण्याचा निर्णय स्वत:च्या आई -वडिलांना समजावून सांगण्या इतपत भेकाड होतीस का? आणि का ?" यावर तीच उत्तर होत हो मी तुझ्यावर खर प्रेम केल आणि मी भेकाड होती मात्र का ? याच उत्तर माझ्याकडे नाही.  त्याचवेळी मुलाने म्हटल या प्रश्नांचे खरे नी स्पष्ट उत्तर ऐकूण तुझ्या आयुष्यातून बाहेर पडण्याचा माझा खंबीर निर्णय होता तो कायम आहे पण तू माझ्या प्रश्नांच समर्पक उत्तर  दिल नाही थोड धाडस केल असत तर आपल प्रेम लग्नात परावर्तीत झाल असत आणि आजही तू स्पस्ट बोलायच धाडस करत नाहिएस. तेव्हा आज पासून हे चाप्टर क्लोज आणि आपले फोन वरुन संवादही बंद. पण त्याला रहावे ना लग्नानंतरही तो त्या मुलीची आठवण झाल्यावर तिला फोन करीत असे आणि ती सुध्दा फोन उचलत असे. ते दोघ एकमेंकांचे जोडीदार होऊ शकले नाहीत पण त्यांनी आपल्या निखळ मैत्रीच नात जपलयं. पुढे त्या मुलाने कष्ट उपसून सरकारी नोकरी मिळवली व स्वत:ला सिध्द करुन दाखवल. तेव्हाही त्या मुलाने घरी फोन करुन झाल्यानंतर पहिला फोन तिलाच करुन ही गोड बातमी ऐकवली. हो एक चांगली गोष्ट म्हणजे लग्नानंतरही तीने आपले पदव्युत्तर शिक्षणाचे पेपर दिलेय. आता तिच्या लग्नाला 1 वर्ष पूर्ण होत आहे तीला तिच्या नवर्‍याने आणि कुटुंबाने घालून दिलेल्या चाकोरित पण चेहर्‍यावर स्मीत करत आणि  तिच्याच शब्दात सांगायचे तर  "आनंदी जीवन जगतेय" वास्तव सांगयचे तर तिच्या सो कॉल्ड उद्योगपती नवर्‍याला तीला हनीमूनला घेऊन जाण्यासाठी अजून पर्यंत सवड मिळालेली नाही तिचा ऑलवेज ड्रिम असलेला आग्रयाचा ताजमहाल बघण्याची इच्छाहीही लग्नानंतर अपूर्णच आहे.
                           तो मुलगा तर लग्न करून 'आयुष्याची वाट पुढे रेटेल' ती सुध्दा 'त्याग बीग' करुन संसाराचा गाडा पुढे रेटेल. पण प्रश्न अनुत्तरीतच आहे ' त्या मुलाच्या भावनाही त्याच आहेत' 
" अखेरचे येतील माझ्या तेच शब्द ओठी , लाख चुका असतील केल्या केली पण प्रिती"           

Friday, March 23, 2012

पत्र लिखान गेल कुठे

आजच्या टेक्नो युगात आता पत्र लिखान कुठे राहिले आहे ?असा विचार करत असताना मला लक्षात आल की , गेल्या ६ वर्षात मी फक्त ६ पत्र लिहिलीत। मोजक्या शब्दात आपल्या भावना व्यक्त करण्याच माध्यम म्हणजे पत्र आज याला मेसेज आणि इमेल हा पर्याय म्हणून जरी उभा ठाकला असला तरी फक्त फॉरवर्ड ऑप्शन वापरून संवाद साधन्यात khrach maja आहे ka ? ashya ekanek prshnani manat kalwa kela।
मी ६ vit असताना pahil पत्र lihilay mjhya Aai la. nuktach mamankade shikayla aalo hoto te Khedgaon gavach nav Vihigaon। pahilyanda gharapasun lamb rahat aslyan aai chi khup aathvan yet hoti। Mag पत्र lihayla ghetla tyatla mayna hota " aai मला tujhi phar aathavan yete devani मला jar ka pankh dile aste tar मी lagech udun tujhya kade aalo asto" te पत्र aajhi majhya aai ne sangrahi thevla आहे। shaley jivnat aailach पत्र pathvat hoto। nantar me eka shibirala gelo hoto tithe kahi mitranchi olakh jhali। tyancha patta lihun ghetla आणि mag tya mitrana ptra लिखान karu laglo pan tyat sarvat jast पत्र Gajanan Rajurkar ( Mana kurum) याला लिहिलीत tyache patrahi मला yet । yantar vivdh sprdha, karyakram adinchya madhyamatun baher jan vhyach आणि pattynchi dewanghewan vhyaychi। lagech पत्र लिखान vhyach । shahstriy sangit shikat असताना aamchya gurujinna Diwali nimitta aalel jesht sahittik Ramshevalkar yanch shubhecha पत्रbaghun मी phar prbhavit jhalo hoto।
majhi dhakti bahain Janhvi la lihilel पत्र , gajanala lehilele पत्र aajhi majhya sangrhi aahet। kadhi madhi te पत्र me wachat aasto khup bar watat tyane।
Patravyvhar punha suru karava म्हणून majha sikhak Mitra Nilkanth Mahlle आणि Mame bhau Pranav Potdukhe ( BE 2nd Year) yana पत्र लिखान karu laglo। suruwatila फक्त prnavcha pratisad aala। mihi ३ ch पत्र tyala lihili । pan हा upkram lavkarach sampushtat aala।
ptra likhanane aapnas ekagra chittane आपल्या भावना kagdavar utravya lagtat tyacha aanad kahi veglach asto, hi पत्र sangrhi theun te aapan kadhihi vachu shakat hoto. eke kali gharat कुठे तरी patrancha khach lagun ase आता matra मेसेज आणि इमेल ni hi jaga ghetli आहे। ya navin madhyamanmule( इमेल, मेसेज ) velechi bachat houn kam sukar jhali khari pan पत्र likhanachi maja matra yat nahi he tevdhach vastav आणि khar hi आहे असा मला watate । ptra likhanababat pratekkache vegvegle mat asu shakte । pan पत्र लिखान he मला ajun hi samwadach prbhavi माध्यम आहे असा watete। tenvha aapan he माध्यम tikvun thevnyasathi pudhe aalo pahije nahi ka?

Tuesday, March 20, 2012

नमस्कार तब्बल दोन वर्षानंतर ब्लॉग वर कही खरडाव म्हणून
उद्या माझा वाढदिवस ! पण, मनात प्रचंड कालवा कालव
गेल्या १० वाढदिवशी रक्तदान करण्याची माझी परम्परा प्रकृति थोड़ी bari नसल्याने तुटेल ka ?
vayo warsh 18 astana sarvaprathm me aapla wadhdiwas Raktdan karun sajra kela. Thikan Sitabai Sangai Highschool Anjangaon surji yethe Aamdar Bachhu Kadu yanchya prhar sanghtnene aayojit kelele Raktadanshibhir hote te. Ya nantar Darwarshi Wadhdiwas aani Gurupornimela ase warshatun don wela Raktdan karnyas me agdi dolas pane suruwat keli ata paryanta yadware jawal pas 60 loknchya madtis aalyacha mala mansvi Aanand aahe( Ekavedi 300 ML Rakta - tyatun ekachveli 3 rugnana madat keli jate).
Mala Raktadana karnyas gharatunch virodh jhala. majhe mama, aaji ( aajolchi), kaka, adhe madhe Aai, Vadilbhau Pan ha virodh arthatach premapoti aani tyanchya Raktadanvishyeechya adhnyanapotipan asawa. Tyanchyamate Raktadan kelyane "Me kamjor hot chalaloy ", 'Rakt kadhun te vikla jat ' Ityadi. Pan me ya virodhala na jumanta tyana kadhi tari yach mahatva patel ya vicharane aapla karya avyahat suru thevla ani suru thevnar.
Me 10 vit astanach Raktadanavishyee Wartmanpatra , Masik ,Saptahik Adinmadhunch mahiti milvat hoto. ya vishyee scintific karna janun ghet hoto tenvha mala kalun aal ki Raktadan kelyane kamjori yet nahi dilel rakta 3 mahinyat parat shrir bhrun kadht. Raktadan kelyane Apghatat jakhmi jhalele lok, prsutit mahilana lagnar rakta , vivdh shashtrkriyansathi raktachi avshykta yana majahi madat hoil aani samaj karyat me hi kharicha wata uchlu shkel. Tasech pratyeksh aprtyksh majhya aaj paryantchya watchalit mala margadarshak tharlelya servach margadarshkana 'Guru Dakshina' mhanun dar varshi Gurupornimela Raktadan karnyacha majha vichar me pratkshat aanla .
Majaha bhr sarkari raktapedhitch raktadan karnyawar Asto. Majhe Natewaik(4 Batli Rakta), Dellit Presswali untyche pati (2 batli) untycha jawai (1 batli) ani Sharad Pawar yanche assistant personal secretary Raut yanchya bhavachya Kidny Transplant Operationsathi kele raktadan aani Caradwaril raktachi madat he live anubhav sangta yetil. yavyatirikta raktadan kelyanantar Gorgarib jantela sarkari blood banketun ya raktachi madat jhali aahe.
Ya upkrmatil Thodch pan Mahatvach yash. Majha punyacha mitra Ashok Javle , Majha Thorla Bhau Manish Bhuyar aani Mame Bhau yani raktadan karun sangitlel te wakya" aata Amhihi tujhyach sarkhe wadhdiwshi raktdan kele'. aasha aahe ya olit adhik bharach padel.
Udya majha 29 wa Wadhdiwas aahe pan thodhi tabbet bari naslyane me Raktadan karu shakel ka ya babat sashnkta aahe. Matra, mala majhya will powerwar hi vishvas aahe mhnun me Vishvasane sangto me nakkich Raktadan karnar. Mjhya 27 vy Waddiwshi majhya eka maitrinine mala vicharal tula mala gift dyaych aahe ' kay hav aahe tula sang' majh uttar hot majhyprmane Raktadan karun tu mala gift de. te dhadshich majhya sobat Dillititl Rammanohar Lohiya Hospitalmadhil Rktpedhit aali. Raktadanacha form bharla tine pan check up madhe doctorni tila reject kel ticha HB . 7 ni kami hota mhnun. Ti jari mala he gift deu shkli nahi tari me tichya dhadsala salam karto. mulihi yogya sharirik wajan aani HB asel tar Raktadan karu shktat he me yethe aawarjun namud karto.
Sarteshvti Aapnas Awahan karto "Aapnhi ya Manvikaryat sahbhagi vha" .
Dhnyawad .

Sunday, July 4, 2010

पाऊस दाटलेला. . . . . . .


आपना सर्वांना नमस्कार।

काय लिहाव हेच सुचेना पहिल्यांदा ब्लॉग लिहितोय. अनायशे दिल्लीत पाऊस पडला.  मागील दोन वर्षात एवढा मोठा पाऊस माझ्या दिल्लीतील वास्तव्यात पहिल्यांदाच बघीतला. पहाटे 4 वाजता  पावसाचे टपोरे थेंब पडत असल्याचा भास  झाला थोडा बिछान्याहून उठलो आणि गॅलरीत येउन उभा राहिलो खरंच बाहेर धो-धो पाऊस सुरु होता. डोळयात झोप पण होती. तसाच परत बिछान्यावर जावून पहुडलो पण, आता झोपच येत नव्हती . मग पावसाच्या  जुन्या आठवाणीत शिरलो.
मी तसा 5 वी पासनं मामांकडे खेडेगावात  शिकायला गेलो. मामंच गाव म्हणजे भारी मजा  निसर्ग संपदा भरभरून आहे इथे  'विहीगाव' या गावाच नाव. शहानुर नावाची नदी ही गावाची अगदी सिमारेषाच.  पावसाचे दिवस म्हणजे  खेड़ेगावात घरोघरी पार्टीचा माहोल गरमा गरम भजी व अन्य तळलेल्या पदार्थांचा बेत तर अगदी कुठे गेलाच नाही। घरी कचोरी करायचा प्लॅन फिक्स झाला. आता कचोरितील मसाल्यासाठी मुगाच्या शेंगा आनायच्या होत्या. माझा लहान मामा शामसुंदर आणि मी असे दोघांनी मिळून शेतात जावून मुगाच्या शेंगा तोडून आनाव्यात असा निर्णय झाला .मग काय , एक भली मोठी पिशवी घेउन निघालोत आम्ही शेताकडे .

गेल्या दोन दिवसांपासून गावात सतत पाऊस पडत होता. वाटेतच मातीचे घर कोसळलेले दिसले मग रस्ता बदलून वेगळा रस्ता पकडला. तसेही गावात मातीची घर मोठया प्रमाणात असल्याने पावसाळयात सततच्या पावसाने मातीच्या भितींत पाणी मुरून घर कोलमडून   त्याची माती इतस्तहा पडून दैनंदीन वापरायचे रस्ते बंद होने नित्याचेच.  शेताकडे जाताना  गावची नदी ओलांडून पुढ जाव लागत. आज कमरे एवढ पाणी होत नदीला  मामांचा हात धरून वाहत्या पाण्याच्या प्रवाह पार केला. अण शेताच्या रस्त्यावर आलो. पावसात शेताची वाट म्हणजे लई बिकट वाट पायातील चपला हातात घेऊन शिस्थीत चालाव लागत नाही तर थोडा चुकलात की पायात काटा गेला समजावा. आम्ही सकाळी ८ वाजता निघालो पाऊस सुरूच होता .  छत्री अण घोंगडी( पावसापासून संरक्षण व्हाव म्हणून अंगावर घेतलेल जाड पोत)  अंगावर घेवून पाऊस झेलत आम्ही शेत जवळ करत होतो. तास भाराच अंतर कापत शेतात पोचलो . वाटेत मामाकडून बरीच माहिती मिळत होती. हे पलिकडले शेत अमक्याचे त्यापलिकडचे टमक्याचे  आणि कधी एकदम सामान्य ज्ञानावर आधारीत प्रश्न विचारून  मला बोर होणार नाही याची पूर्ण काळजी मामा घेत होता .

आता शेत जवळ आल .शेतात शिरताच आम्ही शेंगा तोडायला सुरुवात केली. मामाने मला आधीच सांगीतल होतं कोणत्या शेंगा तोडायच्या नी कोणत्या नाही ते. मामाचा शेंगा तोडायचा वेग भारी होता. मी आपला कासव गतीन शेंगा तोडत होतो. एवढयात मामा केव्हा पुढे निघून गेला हे मला कळलेच नाही. आजूबाजूच्या शेतातही कोणी दिसत नव्हत.  वरून पावसाची रीप रीप सुरुच होती. एव्हढयात शेता शेजारून जाणारा एक म्हातारा(अजाबरावजी अभ्यंकर-सोकारी) माझ्याकडे बघत म्हणतो  'कोण आहे रे तिकडे, चोरी चाल्ली का शेंगाची?' मी म्हटल नाही आजोबा शामसुंदरचा भाचा आहे मी घरच्यासाठी शेंगा घेवून जातो जरा. खात्री पटल्यावर ते आजोबा म्हटले बरे तर. लवकर निघा पोरांनो घराकडे सततच्या पावसान नदीला पूर येण्याची दाट शक्यता आहे असा इशारा देवून ते आजोबा तर निघून गेले. आता मात्र मी पुरता घाबरलो होतो. मामा जवळ दिसत नाही आजुबाजूच्या शेतात कोणीच नाही निर्जन जंगल वरून पावसाची रिप रिप त्यामुळे अंग भिजून जोरदार कपकपी भरत होती. मामाला जोर -जोरात आवाज देताना भर पावसात माझा गळा कोरडा पडला होता.  मामाचा काही पत्ताच नव्हता.

मी शेंगा तोडायच्या थांबवल्या सतत पडत असलेल्या पावसाने मी खूप भिजलो होतो. त्यात भरीस भर म्हणून जोराचा वारा वाहत होता. त्यामुळे शरीराला कापरे धरले होते मी थर थर कापायला लागलो होतो.  मामा काही जवळपास दिसत नाही हे पाहून मी हंबरडा फोडला जोर जोराने रडायला लागलो प्रचंड भिती वाटत होती. रडून रडून थकलो पोटात आग पडली होती. भर पावसात खूप जोरदार भूख लागली होती. मनात मामाचा खूप राग येत होता म्हणून मनातल्या मनात मामाला शिव्याची लाखोलीही वाहत होतो लिटररी अगदी घाणेरडया शिव्या देत होतो . शेवटी मामा माझ्या पुडयात येवून उभा राहिला अण म्हटला अरे आपल्या चिकणीच्या शेतात( शेताच स्थानिक नाव)  गेलो होतो जरा फेर फटका मारायला. एवढ रडायला काय झाल तुला काय शेतात वाघ बिघ खायला येणार व्हता होय! असे समजवत तो म्हटला चाल आता पुरे होतील एवढया शेंगा चल निघू घराकडे. 

मी सांगितल त्याला की, नदीला पुर येणार असल्याचे सांगितले एका वाटसरुने. पण, मामाने मला धिर देत सांगितले, ‘ अरे राजा घाबरू नकोस, मला पोहता येतं त्यामुळं मी सुरक्षीत नेईन तुला नदीपलीकडे. पण, माझं थरथरनार अंग अन मनातील भिती काही केल्या थांबत नव्हती.  शेतातून घराच्या दिशेने चालता-चालता गाव नजिक आल होत. गावात शिरण्यासाठी आम्हाला आता नदि ओलांडून जाण्याचे दिव्य आता आमच्या समोर उभे ठाकले होते. जसा नदी जवळ आलो तसे नदिच्या पाण्याचा वेग आणि पाण्याची वाढलेली पातळी पाहून मी घाबरून गेलो. एव्हाना नदिच्या पलिकडच्या किनारी गावकरी जमले होते. आता नदिच्या या किना-या उभे असलेल्या आम्हा मामा-भाच्यांकडे सर्वांच्या नजरा टिकून राहिल्या होत्या. आणि आता ही दोघं नदी कशी पार करणार याकडे सर्वच उत्सुकतेने बघत होते.  

          मामा, मला धिर देत होता. मात्र, पोहण्याच्या कौशल्यात शुन्य असणारा मी नदिचं विस्तीर्ण पात्र व  वरून कोसळणा-या पावसाने पुरता गारठून गेलो होतो. आता मामाने युक्तीबाण गारठलेल्या शरीरात पूर्ण बळ भरून  आमच्याकडे असलेली शेंगांची पिशवी पलिकडच्या किना-यावर फेकली आणि ती सुखरूप पोचलीही.  आता मला खांदयावर घेत मामा नदिच्या पात्रात शिरला. पाण्याला जोरदार प्रवाह होता त्यामुळे खांदयावर मला घेवून नदिपात्रात थोडा दूर गेलेला मामा परिस्थितीचा रोख लक्षात घेत मागे वळला. मामाचे बॅक फुटवर येणे मला मात्र पुरते घाबरवून गेले मनात भलते सलते विचार येऊ लागले जसे की आपण पाण्यात वाहून गेलो तर येथेच जलसमाधी  !. (आणि समाधीवर शब्द ओळ – भरपावसात शेंगा आणण्याचे दिव्य करताना शहीद झालेला जवान).  

          मामाने रणनिती आखत पुन्हा नदिपात्रात प्रवेश केला. थोडा दूर जात नाही तोच मामाच्या पायाखालचा नदितील दगड सरकला व मामाचा पाय घसरून मामा व त्यांच्या खांदयावरचा मी असे दोघेही नदिपात्रात पडलो. हे चित्र बघताच नदि काठावर असलेल्या एकाने क्षणाचाही  विलंब न लावता नदित सूर मारून मला बाहेर काढले. मामा पोहत पोहत किना-यावर येताच माझ्या काळजी  पोटी तो  जवळ आला.  त्यानंतर बहुदा घाबरलेली  माझी अवस्था व गारठलेल शरीर यामुळे माझी शुध्द हरवली.
          थोडा वेळाने जेव्हा शुध्दीवर आलो तेव्हा बघतो तर मी घरी आलो होतो आणि माझ्या अंगावर दोन जाड रजई आणि ब्लँकेट असा सर्व थाट होता. माझ्या समोरचे चित्र असे की, मामी कचोरी बनबण्यात मश्गुल तर मामा तिला  पाक कार्यात मदत करीत होता. थोडा वेळाने कचोरी तयार झाली आणि जिच्यासाठी हा सर्व खटोटोप चालला होता ती कचोरी एकादाची माझ्या पोटात गेली आणि  भर पावसात  इतका वेळ माझ्या पोटात पडलेली आग एकदाची शांत झाली.  
                  


 आणि या प्रसंगापासूनच मी भर पावसात शेतात जाण्याचे टाळले ते थेट आतापर्यंत. पण तो पाऊस मला अजही हवा हवासा वाटतो. दुर्देवाने आता तसा पाऊस पण येत नाही आणि विहीगावातील शाहनूर नदी पण कधी दुथडी भरून वाहत नाही. अरेच्या,  हा लेखन प्रपंच सुरु असताना मी विसलोच की घडयाळीत सकाळचे ७ वाजले होते आज ऑफीसला सुटीच होती पण आठवडाभराची माझी रखडलेली कामे तर शिल्लकच होती चला तर आवरतो आता……….
                                I miss that rain